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वन विभाग की नाकामी या मिलीभगत? बीजापुर के जंगलों में ‘ग्रीन नरसंहार’

1000 करोड़ से अधिक का नुकसान, मशीन, आग और कुल्हाड़ियों से तबाही का खुला खेल

PMGSY सड़कों के नाम पर लाखों पेड़ों की कटाई, तस्करी नेटवर्क भी सक्रिय

बीजापुर – बीजापुर के घने जंगल इन दिनों सुनियोजित विनाश का शिकार हो रहे हैं। यह कोई सामान्य कटाई नहीं, बल्कि मशीनों, कुल्हाड़ियों और आग के जरिए चल रहा संगठित अभियान है, जिसने हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। प्रारंभिक आकलन में 1000 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान की आशंका जताई जा रही है, लेकिन जिम्मेदार वन विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब तक न तो ठोस कार्रवाई दिखाई दी है और न ही स्पष्ट जवाब।

विकास के नाम पर विनाश—–

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बन रही सड़कों ने जंगलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। नियमों के अनुसार सीमित दायरे में पेड़ों की कटाई की अनुमति ली जानी चाहिए थी, लेकिन यहां सड़कों के दोनों ओर 20 से 100 मीटर तक के दायरे में बड़े पैमाने पर पेड़ों को उखाड़ दिया गया। भारी मशीनों का इस्तेमाल कर जड़ों समेत हजारों पेड़ नष्ट कर दिए गए। सवाल उठ रहा है कि क्या इन कार्यों के लिए वैधानिक अनुमति ली गई थी, और यदि ली गई तो इतनी व्यापक कटाई कैसे हुई।

तस्करी का संगठित नेटवर्क—–

बीजापुर के जंगल अब तस्करों के लिए आसान लक्ष्य बन गए हैं। सागौन समेत कीमती लकड़ियों की कटाई खुलेआम हो रही है। लकड़ी का परिवहन दिनदहाड़े किया जा रहा है और इसे सीधे तेलंगाना तक पहुंचाया जा रहा है। वन विभाग की निष्क्रियता इस पूरे मामले में मिलीभगत की आशंका को और मजबूत करती है।

आग पर काबू पाने में नाकामी—–

जंगलों में लग रही आग ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। आग के कारण बड़ी संख्या में छोटे पौधे नष्ट हो चुके हैं। इसके बावजूद वन विभाग आग पर नियंत्रण पाने में नाकाम साबित हुआ है। जबकि वन संरक्षण और प्रबंधन के लिए हर साल लाखों रुपये का बजट जारी होता है, जमीनी स्तर पर उसका असर नजर नहीं आ रहा।

अंदरूनी आवाज़ ने बढ़ाई चिंता——-

वन विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। उनके अनुसार विभागीय कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं और जमीनी स्तर पर निगरानी बेहद कमजोर है।

कटे पेड़ों में भी घोटाले की आशंका——

कटाई के बाद लकड़ी को वन डिपो तक पहुंचाने की प्रक्रिया भी संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि ठेकेदार खुद ही लकड़ी को गायब कर तस्करी नेटवर्क तक पहुंचा रहे हैं। यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध की ओर इशारा करता है।

पर्यावरणीय असर साफ दिखने लगा—–

स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगलों के तेजी से खत्म होने का असर अब मौसम पर भी दिखाई देने लगा है। तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है और बारिश में कमी देखी जा रही है। पहले जहां घने जंगल प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते थे, अब वहां पर्यावरणीय असंतुलन साफ नजर आ रहा है।

वन्यजीवों पर भी संकट—–

जंगलों के खत्म होने से वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में है। खुले क्षेत्र में शिकारियों की गतिविधियां बढ़ गई हैं, जिससे जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ रहा है।

जिम्मेदारी तय करने की मांग—-

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बड़े नुकसान के लिए जिम्मेदार कौन है। क्या वन विभाग केवल कागजी संरक्षण तक सीमित रहेगा या वास्तविक कार्रवाई होगी? क्या सरकार इस मामले में उच्च स्तरीय जांच कराएगी, या फिर जंगलों का यह विनाश इसी तरह जारी रहेगा?

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